आत्मा का संचार और ऊर्जा..

पहले तो यही बड़ा प्रश्न हैआत्मा क्या है ? शरीर के किस भाग में रहती है ? उसका स्वरुप क्या है ? क्यूँकि आत्मज्ञान ही ब्रम्हज्ञान है ! जिसने अपने आपको जान लिया उसने ब्रम्ह को जान लिया ! क्यूंकि अपना आप जो है वह ब्रम्ह का अंश है ! तो अगर हमने अंश को देख लिया तो फिर संपूर्ण को देख सकते है, नही तो कमसे कम संपूर्ण की परिकल्पना तो कर ही सकते है ! लेकिन जब तक अंश को भी नहीं देखा तब तक परिकल्पना भी संभव नहीं ! क्यूंकि वो परिकल्पना नहीं हो रही थी, इसलिए लोगोंने जहाँ जैसा ठीक लगा वैसा ब्रम्ह बना लिया, अवतार बना लिए ! पहले १० अवतार थे फिर २४ हो गए ! अभी एक की प्रतीक्षा हो रही है ! पथरों को, मूर्तियोंको, चट्टानों को, पहाड़ों को, नदियों को ब्रम्ह का स्वरुप मान लिया ! गंगा में स्नान करो तो सारे पाप धूल गए , कैसे धो देगी गंगा ? पाप तुमने किये, पापोंका फल भोगोगे तब पाप से मुक्ति मिलेगी ना ! नहीं तो दुनिया भरके पाप करो और हर महीने चले जाओ एक डुबकी गंगा में लगाने के लिए ! ऐसा नहीं हैं, आत्मा अदृश्य है, लेकिन अदृश्य का अर्थ ये नहीं है कि “है नहीं ” ! हवा है की नहीं है ? किसीने नहीं देखी, ना कोई देख सकता हैं लेकिन क्या ये मान ले हवा होती ही नहीं ! आत्मा है की नहीं ? क्या मान ले आत्मा होती नहीं ! ब्रम्ह दिखता ही नहीं तो मान ले ब्रम्ह होता नहीं है ? होता है तो सब मानते है, युगो युगों से मानते चले आ रहे हैं ! शरीर जब नहीं रहता है मिट्टी हो जाता है तो क्या कहते रहें हैं ? युगों से ही कहते आये हैं आत्मा निकल गयी ! तो इसका मतलब है ये शरीर तुम्हें या मुझे नहीं मिला है, ये शरीर आत्मा को मिला है ! ये वस्त्र है आत्मा का ! कोई माता Conceive ही नहीं कर सकती अगर Soul available न हो ! क्यूंकि माँ के पेट में शरीर बनाना किसके लिए है ? आत्मा के लिए ना, तो आत्मा होगी तो शरीर बनेगा ! आत्मा नहीं है तो शरीर किसके लिए बन रहा है ?  आत्मा वायु तत्व है, Aerial है ! उसको देखा नहीं जा सकता लेकिन जिस तरह से हवा को महसूस किया जा सकता है, उसी तरह आत्मा को महसूस कर सकते हैं ! और ईश्वर ने तीसरी आँख भी दे रखी है, इसको खोल लो तो देख भी सकते है ! फिर हवा को भी देख सकते है, वायु तत्व को भी देख सकते है ! लेकिन वो तीसरी आँख तो दूर की बात है ! पहले तो ये की “आत्मा” मानना  “है “ “की नही है ” ! वि‍ज्ञान हर चीज का प्रमाण मांगता है,सबूत मांगता है ! जब तक में नहीं देखूंगा तब तक में कैसे मानूंगा आत्मा होती है ! ठीक है तुम लगे रहो कई दशक, कई साल, कई महीने .. कभी ना कभी पहुँच ही जाओगे वहाँ जहाँ तुम कोई यन्त्र के सहारे शायद देख सको ! अब शरीर के अंदर आत्मा कहाँ रहती है इस पर लोग विचार नहीं करते है, जब की उनको पता है कि इसके निकल जाने से ये शरीर समाप्त हो जाता है ! ये हृदय चक्र के ऊपर रहती है ! शरीर के बाएं भाग में ! और यही से शरीर का निर्माण होता है ! अब उसको यहाँ से बाहर ले जाना है तो उसके दो ही तरीके है, एक तो ये जब ईश्वर की इच्छा हो, जब शरीर के कर्म ख़तम हो जाये ! जब शरीर को कोई साँस ना मिले तो ये निकल जाएगी शरीर से ! और निकलने के बाद कहाँ जाएगी ? विभिन्न धर्मों के अपने अपने मत है ! इस्लाम कहता है कबर में जाएगी, शरीर के ऊपर ही रहेगी और क़यामत के दिन फिर निकलकर प्रभु के सामने पेश होगी ! ईसाई भी लगभग ऐसा ही मानते है ! हिन्दू ये मानते है के शरीर छोड़ने के बाद आत्मा को इस आकाश के पार जाना है जहाँ ऐसी आत्माओं का एक लोक है, एक संस्कार है जो शरीर छोड़ चली जाती है ! वहाँसे उनको पुनर्जन्म मिलता है !किसी और माँ के पेट में भेजी जाती है ! इसको मृतलोक कहते हैं ! मृतलोक पहुंचाने के लिए हिंदुओंके धर्म में अनेक प्रकार के विधि विधान बना हुआ है, पिंडदान है, क्रियाकर्म है ! ये सब उस आत्मा को मंत्र शक्ति मिले और उस मंत्र शक्ति से वो इस आकाश से परे मृत लोक में चली जाए ! अगर मंत्र की शक्ति से हम आत्मा को वहां भेज सकते है तो जीते जी भी भेज सकते है ! अगर मंत्र में इतनी शक्ति है की मरने के बाद किसी की आत्मा को हम मृत लोक पहुँचा दे, तो फिर जीते जी भी पहुँचा सकते हैं ! और मृतलोक ही नहीं मृतलोक के आगे जहाँ तक ब्रम्हाण्ड है वहाँ तक भी ले जा सकते है ! इसके लिए ध्यान बना ! ध्यान में क्या है की सबसे पहले साधक अपना शरीर जगाता है ! क्यूंकि शरीर दो प्रकार की एनर्जी का वाहक है ! एक है Arial Energy और दूसरी है Cosmic Energy.. वायु ऊर्जा और ब्रम्ह ऊर्जा ! वायु ऊर्जा तो वायु से मिल रही है !  साँस जो हम अंदर ले रहें है और फ़ेंक रहे है ये वायु ऊर्जा है ! जिससे ये शरीर चल रहा है ! साँस बंद हो जाये तो शरीर समाप्त ! तो अगर हम शरीर को जगा लें, मंत्र शक्ति के साथ तो, फिर हम ब्रम्ह ऊर्जा पैदा कर लेते है ! जब हमारी वायु ऊर्जा शरीर में घूमती है तब पैदा होती है ब्रम्ह ऊर्जा !  अभी तो साँस आया गया , आया गया है ! इसको अंदर रोक लिया, रोक के घुमाया, इसके घूमने से (घुमा रही है मंत्र शक्ति) जो एक और शक्ति पैदा हुई, जो एक और Energy पैदा हुई, उसे ब्रम्ह ऊर्जा कहते है ! ये ब्रम्ह ऊर्जा वैसे ही पैदा हुई जैसे पानी के गिरने से बिजली पैदा होती है ! बिजली पानी के अंदर नहीं है, ना उस चट्टान में है जिस पर ये पानी गिरा है ! इसी प्रकार जब शरीर के अंदर वायु ऊर्जा घूमती है तो ब्रम्ह ऊर्जा का जन्म होता है, ब्रम्ह ऊर्जा पैदा होती है ! और जब ब्रम्ह ऊर्जा घूमने लग जाती है शरीर के अंदर, मतलब जब दो प्रकार की ऊर्जा शरीर में घूमने लगती है (वायु और ब्रम्ह ) तब आत्मा को एक वाहन मिल जाता है शरीर से बाहर जाने का ! और मनुष्य का शरीर ईश्वर ने बनाया इसी प्रकार से है की उसको १० दरवाजे दे रखें है ! दसवा दरवाजा ब्रह्म रंध्र है ! हम ये १० वा दरवाजा अगर खोल लेते हैं तो इससे आत्मा बाहर चली जाती है ! लेकिन आत्मा वायु ऊर्जा के साथ जाती है, उससे जुडी हुई है, इसलिए लौटती फिर शरीर में ही ! वह भटक नहीं सकती, इधर उधर नहीं जा सकती ! शरीर से निकली है, पतंग की तरह है, डोर हाथ में है तुम्हारे ! डोर खिंच लोगे तो पतंग निचे आ जायेगी ! और डोर ढीली छोड़ दोगे तो पतंग उड़ती रहेगी ! तो आत्मा शरीर से निकलती है तो सबसे पहले ये आकाश पार करती है जो हमे दिखाई देता है ! और जहाँ जाकर ये आकाश समाप्त होता है वहाँ पाणी है ! उसको वैतरणी कहते हैं ! वैतरणी का अर्थ है पार करने वाली ! उसको पार करो तो हम इस लोक से पार हो गये ! अगले आकाश और इस आकाश के बिच में जो Entrance है वो काली गुफ़ा जैसी है ! इसलिए उसको Black Tunnel कहते है ! वहाँ कोई गुफ़ा नहीं हैं लेकिन वहां जो आकार बन रहा है (दो आकाशों के बीच का ) उस आकाश की जो Shape है वो ऐसी है जैसी काली गुफ़ा हो ! उसमें से आत्मा को निकलना है ! इसमें से आत्मा निकली, मृतलोक में आत्मा रुकना चाहे तो रुक सकती है लेकिन आम तौर पे ध्यान जो करा रहा है वह तुम्हारा गुरु वहाँ रुकने नहीं देता ! इसलिए के उसका लक्ष्य आगे पड़ा है यहाँ तक आना नहीं हैं ! मृत शरीर से निकली आत्माओं का लक्ष्य ही वहाँ तक जाना है ! ध्यान में जो आत्मा निकली है उसका लक्ष्य वहाँ रुकना नहीं हैं, आगे जाना है ! इसी प्रकार अगला आकाश जहाँ से शुरू होता है उसे सिद्धलोक कहते है !  सिद्धलोक की जो सिमा है उस सिमा पर फिर पाणी है ! उसे हमने ब्रम्ह सरोवर का नाम दिया है ! ब्रम्ह सरोवर इसलिए कहा जाता है क्यूंकि इसके पार ब्रम्ह लोक है ! तो आत्मा इन तीन आकाशों में से निकल के जब मान सरोवर पर पहुँचती है तो फिर उसका अगला जो पड़ाव होता है वो होता है अंतिम पड़ाव.. ब्रम्ह… ब्रम्हलोक..! वैसे तो सात प्रमुख आकाश होते है ! लेकिन आपको सरलता से समझने के लिए यहाँ मैं केवल तीन का ही जिक्र कर राहा हूँ !

ब्रम्ह सृष्टि के भीतर नहीं है, सृष्टि के बाहर है ! जैसे फोटो खींचने वाला फोटोग्राफर फोटो के अंदर नहीं होता है ! इसी प्रकार सृष्टि बनानेवाला ब्रम्ह सृष्टि के अंदर नहीं है, सृष्टि के बाहर है ! ये सृष्टि उसने अपने अंशो से रची है और अंश आत्मा है ! अंश आत्मा है इसीलिए सृष्टि बनानेवाला परमात्मा है ! तो शरीर से लेकर ब्रम्ह तक की यात्रा जो है ये Cosmic Energy ( ब्रम्ह ऊर्जा ) के बल पर होती है ! Cosmic Energy ( ब्रम्ह ऊर्जा ) शरीर में पैदा करने के लिए दीक्षा चाहिए और कोई भी मानव शरीर इतनी ऊर्जा नहीं बना सकता !  मानव इतनी ब्रम्ह ऊर्जा पैदा नहीं कर सकता की आत्मा उस पर ब्रम्हलोक तक की यात्रा करे ! गुरु वो ऊर्जा देता हैं जो तुम्हारी आत्मा को चाहिए ! इसिलिए गुरु का महत्त्व है ! जब आत्मा ये सारी यात्रा पार करके मान सरोवर पार करती है और ब्रम्ह लोक में प्रवेश करती है, तब पहेली बार जो आत्मा को परमात्मा मिलती है उसको साक्षात्कार कहा गया है, वो मिलन है ! पता नहीं कितनों जन्मों के बाद जहाँ से आयी थी वहाँ पहुंचती है ! जो थी आने से पहले एक क्षण के लिए वही बन जाती है ! लेकिन अभी उसको शरीर में लौटना है ! लौटना है किसलिए ? क्यूंकि सृष्टि के नियमानुसार हर व्यक्ति को उसके पुराने कर्मों के आधार पर नये जीवन के साँस मिलते है ! तो अभी इन साँसोका भुगतान बाकि पड़ा है इसलिए लौटना है उसको ! और लौटेगी भी, फिर शरीर में आयेगी ! यही से निकली थी अभी थोड़ी देर पहले आधा घंटा, एक घंटा पहले ! अब फिर लौट के आ गयी ! अब शरीर को अपने कर्मों का भुगतान करना है ! लेकिन जिस दिन ये भुगतान समाप्त होगा, उस दिन फिर आत्मा को किसी पंडित की जरुरत नहीं पड़ेगी की मंत्र शक्ति से उसको मृतलोक भेज दे ! क्यूंकि वो तो रोज ही जा रही है, उसको रास्ता पता है, उसको उड़ना भी आता है ! तो वह इस शरीर को छोड़कर सीधी ब्रम्ह में चली जाएगी, उसको किसी कर्मकांड की, पिंडदान की, मंत्रजाप की, गंगा में अस्थि प्रवाह की जरुरत नहीं ! अगर इस स्थिति को पहुंचना है तो फिर अपना शरीर जगाना होगा, शरीर के अंदर ब्रम्ह ऊर्जा  पैदा करनी होगी, ब्रम्ह ऊर्जा को घुमाना होगा, ब्रम्ह ऊर्जा का वाहन बनाकर आत्मा को निकालना होगा ! आत्मा इस लोक से ब्रम्ह लोक तक की यात्रा करेगी, ब्रम्ह के साथ साक्षात्कार करेगी और इस शरीर के समाप्त होने पर सदा सदा के लिए ब्रम्ह में लिन हो जायेगी !

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