गुरु और अध्यात्म

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः !

गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः !!

ये पंक्तियाँ आपने सुनी होंगी या आप किसी मंदिर में जाते होंगे तो आप इसे हमेशा सुनते होंगे ! लेकिन दुःख की बात यह है कि बहोतसे लोगों को इसका अर्थ ही मालूम नहीं है ! “गुरुही ब्रम्हा-विष्णु-महेश हैं, वही परब्रम्ह है और इसलिए हमें गुरु को वंदन करते है, उनकी पूजा करते हैं” ये सामान्य साधक बोलेगा ! ये तो केवल शब्दोंका अर्थ हैं ! आप कहते हो गुरु ब्रम्हा-विष्णु-महेश है, तो आप एक मंदिर से दूसरे मंदिर क्यों भटक रहें हों ? क्योँ सप्ताह कर रहे हों ? क्यों चारधाम जा रहे हों ? आपके घर में भगवान की इतनी मूर्तियां, फ़ोटो क्यों हैं ? क्यों अपनी कुंडली बाज़ार में दिखा रहे हों ? ये सब बाह्य जगत के कर्मकांड है जो पांचवी कक्षा तक ठीक है, आपने गुरु बनाया है इसका मतलब आप पीएचडी कर रहे हों ! आप बोहोत ऊँचे स्तर पर हों ! गुरु ने बताया वही मार्ग पे चलना चाहिए ! मंदिर में भी जाना हों तो गुरु के साथ या अगर गुरु ने बोला तोही ! अगर आपने गुरु को किसी मंदिर में जाने की इच्छा जतायी तो वो आपको क्यों रोकेंगे ?

आपका गुरु पर विश्वास तो होता है पर श्रद्धा नहीं होती ! सच बात तो यह हैं आपको गुरु और गुरुतत्व क्या होता है यह मालूम ही नहीं ! मैंने देखा है कई लोग अपने स्वार्थ के लिए गुरु बनाते हैं, उनके संपर्क में रहते है ! वो मंदिर में भी आतें है तो अपनी भौतिक अपेक्षा और मनोकामना के साथ ! गुरु से कुछ पाने के लिए ! जब कभी भी आपत्ति, संकट आता है तो आप गुरु के पास रोते हुए आते हों और एक बार आपका काम हुआ तो गुरुका आप आभार भी नहीं मानते हों ! यें कौनसी भक्ती ? यें कोनसा अध्यात्म ? आपकी साधना में, अध्यात्म में कोई बाधा न हों इसलिए गुरुदेव आपके भौतिक संकट,दुःख का निवारण  करता है ! कुछ तो नराधम गुरु की गद्दी पाने के लिए गुरु बनाते हैं और मंदिर को अपना सत्ता केंद्र मानते है ! भारत में ऐसे बहोतसे मंदिर,आश्रम पैसा जुटाने के साधन बन गए है !

गुरु शब्द का अर्थ है अंधकार से दूर करने वाला ! गुरु वह है जो शिष्य की अन्तर शक्ति जगा कर उसे आत्मानन्द में रमण कराता है ! गुरु वह है जो शक्तिपात द्वारा मानवदेह में पारमेश्वरि शक्ति को संचारित कर देता है ! जो योग की शिक्षा देता है, भक्ति और कर्म में निष्कामता सिखा देता है ! लेकिन ऐसे असाधारण गुरु को साधारण जड़ बुद्धिवाले नहीं समझ सकते ! परमेश्वर का साक्षात्कार एकमात्र गुरुदेव से संभव है ! आजकल तो कोई भी भगवे वस्त्र पहनकर, गले में माला डालकर समाज में खुद को उच्च कोटि का अध्यात्मिक गुरु दिखाते है !  पैसा जुटाने का एक आसान साधन इस उद्देश्य से कई लोगों ने खुद के आश्रम, मंदिर बनाये ! करोड़ों की जमीन-खेती इकठ्ठा कर दी ! सच्चे गुरु कभी भी पैसे, जमीन, जायदाद में नहीं उलज़ता ! साधारणतया गुरुजनों का परिचय पाना, उन्हें समझना, महाकठिन हैं ! किसी ने थोड़ा चमत्कार दिखाया तो हम उसे गुरु मान लेते हैं, थोड़ा प्रवचन सुनाया तो उसे गुरु मान लेते हैं, किसी ने मन्त्र दिया या तंत्र की विधि बतलायी तो उसे गुरु मान लेते हैं ! इसका परिणाम यह होता है कि हम सच्चे गुरुजनों से दूर रह जाते है ! पाखण्डी गुरु से धोका खाकर हम सच्चे गुरु की अवहेलना करने लगते हैं !

अनेक महत्वपूर्ण विद्याएं गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं और अध्यात्मिक विद्या का प्रवेश द्वार तो अनुभवी मार्गदर्शक के द्वारा ही खुलता है ! रोगी को अपनी चिकित्सा कराने के लिए किसी अनुभवी चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है, यदि वह अपने आप ही इलाज करने लगे तो उसमें भूल होने की संभावना रहेगी, क्योँकि अपने संबंध में निर्णय करना हर व्यक्ति के लिए कठिन होता है ! अपना मुँह अपनी आँखों से नहीं देखा जा सकता, उसके लिए दर्पण की या किसी दूसरे से पूछने की सहायता लेनी पड़ती है, तभी कुछ जान सकना संभव होता है ! उसी प्रकार अपने दोष-दुर्गुणों का मनोभूमि का, आत्मिक-स्तर का एवं प्रगति का भी पता अपने आप नहीं चलता, कोई अनुभवी ही इस सम्बन्ध में विश्लेषण कर सकता है और उसी के द्वारा उद्धार एवं कल्याण का मार्ग-दर्शन किया जा सकता है !  जिसने कोई रास्ता स्वयं देखा है, कोई मंजिल स्वयं देखी है, कोई मंज़िल स्वयं पार की है वही उस रास्ते की सुविधा-असुविधावों को जानता है, नये पथिक के लिए उसी की सलाह उपयोगी हो सकती है ! बिना किसी से पूछे स्वयं ही अपना रास्ता आप बनाने वाले संभव हैं मन्ज़िल पार कर लें, निश्चित रूप से उन्हें कठिनाई उठानी पड़ेगी और देर भी बहुत लगेगी ! इसलिए गुरु की तलाश करना या इच्छा रखना उचित है ! उसी के सहारे अध्यात्मिक यात्रा सुविधापूर्वक पूर्ण होती है ! भौतिक शिक्षाओं के शिक्षक अपने विषय की जानकारी देकर अपना कर्त्तव्य पूरा कर लेते हैं, पर अध्यात्म-मार्ग में इतने से ही काम नहीं चल सकता ! वहाँ शिक्षा ही पर्याप्त नहीं, गुरु द्वारा दिया हुआ आत्मबल भी दान या प्रसाद रूप में उपलब्ध करना पड़ता है ! सच्चे गुरु न केवल आत्म-कल्याण का मार्ग बताते हैं बलकि उस परचल सकने योग्य साहस, बल और उत्साह भी देते हैं ! यह देन तभी संभव है जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-सम्पदा पर्याप्त मात्रा में हो ! इसलिए गुरु का चयन और वरन करते समय उसकी विद्या ही नहीं, आत्मिक स्तर और तप की संग्रहित पूंजी को भी देखना पड़ता है ! यदि वह सभी गुण न हों, तो कोई व्यक्ति अध्यात्म-मार्ग का उपदेष्टा भले ही कहा जा सके, पर गुरु नहीं बन सकता ! गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए ! साधक को ऐसा ही गुरु तलाश करना पड़ता है ! पर सच्चे गुरु कहाँ मिलेंगे ? आप कहाँ उन्हें खोजेंगे ? और आपको कैसे पता चलेगा की कौनसा गुरु है और कौनसा नही ? आपके पास परखने का कोई तरीका भी नहीं ! आप बस अपने गुरु को खोजते रहिए, आप उन्हें जानने की लालसा रखिए ! खोजने का मतलब किसी चीज को पाने की कोशिश नहीं है ! खोजने का मतलब है कि आप उसे खोज रहे है जो आप नहीं जानते ! अगर आपको खोजना है तो आपको पहले से कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए ! खोजना तभी संभव है जब आपके भीतर “मैं नहीं जानता ” गेहराई में बैठा हुआ हो ! अगर आपके भीतर “मैं नहीं जानता” का खालीपन गहरा हो जाता है तो गुरुदेव आप तक जरूर पहुँच जायेंगे !

शास्त्रों का यह मत है कि ईश्वर जीव के उद्धारकर्ता होने के नाते गुरु के रूप में स्वयं अवतरित होते हैं और शिष्य के उत्थान की योजना बनाते हैं ! ईश्वर गुरुओं के परम गुरु माने गए हैं ! वही अनादि आचार्य तत्त्व है ! ज्ञान और धर्म के उपदेश से संसारी जीवों के उत्थान की दृष्टी से गुरु जन्म लेते हैं ! शास्त्रकारी ने गुरु को शिवतुल्य समझा है ! उनके मुताबिक शिवरूपी आकृति मनुष्य नहीं देख सकते, इसलिए गुरु का रूप धारण करके शिवतत्व शिष्यों की सदैव रक्षा किया करते है ! शिव स्वयं ही मानुष विग्रह धारण करते हैं और गुरु रूप से कृपा करके माया में लिप्त जीवों का उद्धार करते हैं !

सब पर अनुग्रह करने वाले करूणानिधि ईश्वर ही गुरु रूप ग्रहण करके दीक्षा देकर जीव को मोक्ष दिलाते हैं ! तभी आन्तर गुरु की श्रेष्ठता को शास्त्र ने स्वीकार किया है ! उनका यह विश्वास है कि आन्तर गुरु प्रत्येक जीव के ह्रदय में अन्तर्यामी रूप से निवास करता है ! इसलिए गुरु के इस स्वरुप को निराकार और चैतन्यमय कहा गया है ! गुरु बिना साधना मार्ग में गति असम्भव ही हैं ! अतः प्रत्येक साधक को चाहिए की वह अधिकारी सत्पुरुष को गुरु वरण करें, गुरु अनुग्रह लें !

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