मनुष्य की अध्यात्मिक शरीर संरचना

एक आदमी को जब हम बाहर से देखते हैं,  तो उसका एक बहुत छोटा-सा भाग ही हमें दिखाई पड़ता है ! उसका बड़ा भाग हमारी आँखों से ओझल रहता है ! आसान शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि आदमी का जो शरीर हमें दिखाई पड़ता है, वह केवल स्थूल है ! सच तो ये है कि शरीर के अन्दर आत्मा को रहने के लिए सात शरीर हैं ! ये सातों शरीर सातों चक्रों से सम्बन्धित हैं ! इन चक्रों से जो शरीरों का लगाव है, वह साधक को छोड़ना अनिवार्य हैं ! इसलिए सभी साधकोंको अपने चक्र खोलना अति आवश्यक बन जाता है ! यही सबका संकल्प भी होना चाहिए ! मनुष्य के इन शरीरों की रचना को समझ लेना बहुत ही आवश्यक हैं ! कुण्डलिनी साधना के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है! सातों शरीर इस प्रकार हैं – १. स्थूल शरीर २. आकाश शरीर ३. सूक्ष्म शरीर ४. कारक शरीर ५. महाकारक शरीर ६. ब्रम्ह शरीर ७. निर्वाण शरीर

  • स्थूल शरीर : बच्चा पैदा होने के बाद सात वर्ष तक स्थूल शरीर निर्मित होता है ! शेष शरीर बीज रूप में रहते हैं ! इन सात वर्षो में भौतिक शरीर का पूरी तरह से विकसित होना जरुरी है ! पशुओं के पास सिर्फ भौतिक शरीर ही होता है ! इन प्रथम सात वर्षों में मनुष्य और पशुओं में कोई विशेष अंतर नहीं होता हैं ! बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका सिर्फ भौतिक शरीर ही निर्मित हो पाता है और आगे के शरीरों का कोई विकास नहीं हो पाता है ! ऐसे लोग पशुवत जीवन ही जीकर मर जाते है ! भौतिक शरीर में रहने वालों में नक़ल करने की आदत होती है ! उस समय तक बुद्धि विकसित नहीं हो पाती है ! इसलिए पहले सात वर्षों तक बच्चों में अनुकरण अथवा नकल करने की प्रवृत्ति प्रमुख रूप से बनी रहती है !
  • आकाश शरीर : दूसरे सात वर्ष में आकाश शरीर अथवा भाव शरीर का विकास होने लगता है ! व्यक्ति में भावनाओं का जन्म होता है ! उसमें प्रेम और आत्मीयता की प्रवृति विकसित हो जाती है ! अब व्यक्ति अपने तक सिमित नहीं रहता है ! वह दूसरों भी अपने संबंधों का ताना-बाना बुनने लगता है ! विकास का यह चरण व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके कारण ही वह पशु से कुछ ऊंचा उठता है ! उसमें मनुष्य होने की गरिमा आने लगती है ! बहुत से लोग ऐसे हैं, जो चौदह वर्ष के ही होकर रह जाते हैं ! उनमें आगे का विकास नहीं होता है!
  • सूक्ष्म शरीर : तीसरे शरीर में विचार, बुद्धि और तर्क की क्षमता विकसित होने लगती है ! यह शरीर १४-२१ वर्ष तक विकसित हो जाता है ! इस अवधि में शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति विकसित हो जाती है ! बौद्धिक चिंतन एवं विचार इस जीवन के प्रमुख आयाम हैं !
  • कारक शरीर : विचार-जगत से भाव-जगत व मनस्मृती -जगत अधिक गहरा होता है ! मन की प्रधानता के कारण ही व्यक्ति मनुष्य कहलाता है ! इस शरीर में कलात्मक भावों की प्रधानता होने लगती है ! सम्मोहन, टेलीपैथी, दूरदर्शिता ये सब चौथे शरीर की संभावनाएं हैं ! यद्यपि इस शरीर में धोखे और खतरों की संभावना बहुत अधिक रहती है, फिर भी इसका पूरी तरह विकसित होना बहुत जरुरी होता है ! कुण्डलिनी चौथे शरीर की घटना है ! चौथे शरीर में मनुष्य को कल्पनाएं घेरने लगती हैं, जो उसको एक प्रकार से जानवरों से श्रेष्ठ बना देती हैं ! मनुष्य की तरह जानवर कल्पना करने में असमर्थ होते हैं ! चौथा शरीर २८ वर्ष तक विकसित होता है, लेकिन कम लोग ही इसे विकसित कर पाते हैं !
  • महाकारक शरीर : यह शरीर बहुत ही महत्व का होता है ! इसे अध्यात्म शरीर भी कहते है ! अगर जीवन का विकास ठीक ढंग से होता रहे, तो यह ३५ वर्ष की उम्र तक विकसित हो जाता है ! परंतु यह दूर की बात तो है ही, क्योंकि अधिकांश लोगों में चौथा शरीर ही विकसित नहीं हो पाता है ! चौथे शरीर में कुण्डलिनी जगे, तो ही पांचवें शरीर में प्रवेश हो सकता है, अन्यथा नहीं ! पांचवें शरीर तक पहुंच जाने वाले लोगों को हम सही मायने में आत्मवादी कह सकते हैं ! इस शरीर में आकर ही आत्मा हमारे लिए केवल एक शब्द मात्र ही नहीं, बल्कि एक अनुभव बनती है ! यहां पर एक खतरा यह भी है कि पांचवे शरीर पर पहुंचकर आत्मा के अस्तित्व का अनुभव तो होता है, परंतु परमात्मा अभी भी प्रतीति से दूर रहता है ! ऐसा व्यक्ति आत्मा को ही परम स्थिति मान बैठता है !
  • ब्रम्ह शरीर : छठा शरीर ब्रम्ह शरीर कहलाता है ! इसे कॉस्मिक बॉडी भी कहते हैं ! ऐसा व्यक्ति जो आत्मा को पांचवें शरीर में उपलब्ध कर ले तथा उसको पुनः खोने को भी राजी हो, केवल वही उठे शरीर में प्रवेश कर सकता है ! वह ४२ वर्ष की उम्र तक विकसित हो जाना चाहिए !
  • निर्वाण शरीर : सातवां शरीर ४९ वर्ष तक विकसित हो जाना चाहिए ! सातवा शरीर ही निर्वाण शरीर कहलाता है ! वास्तव में यह कोई शरीर नहीं हैं, बल्कि देह शून्यता की स्थिति है ! वहां पर शरीर जैसी कोई स्थिति नहीं रहती है ! शून्य ही शेष बचता है, शेष सब समाप्त हो जाता है ! यहां मैं – तू दोनों नहीं होते ! यही परम शून्य है, निर्वाण है !

इस प्रकार की उपरोक्त सातों शरीरों की स्थितियां हैं ! मोक्ष पांचवे शरीर की अवस्था का अनुभव है ! चौथे शरीर का अनुभव स्वर्ग-नर्क का है ! दूसरे और तीसरे शरीर पर रुकने वालों के लिए जन्म, मृत्यु और जीवन ही सब कुछ है ! छठे शरीर में पहुंचने पर मोक्ष के भी पर ब्रम्ह की संभावना है ! वहां न कोई मुक्त है और न अमुक्त ! ‘अहं ब्रम्हास्मि’ की घोषणा छठे शरीर की संभावना है, लेकिन अभी एक कदम और बाकी है और वो यह है की जहां न अहं, न ब्रम्ह ! जहां मैं-तू दोनों नहीं, परम शून्य ! परम निर्वाण की स्थिति है – यही सातवें शरीर की स्थिति है !

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Nice…