ध्यान साधना

https://diabetesfrees.com/metaglip-review-useful-medical-facts-for-patients/ मोक्ष प्राप्ती के लिए ध्यान ही एकमात्र श्रेष्ठ मार्ग है ! यह ऐसा रास्ता है जो पृथ्वी और स्वर्गलोक को जोडता है तथा साधक को ब्रम्ह के अमर धाम तक ले जाता है ! किसी स्थूल विषय या भावात्मक विचार पर मन को स्थिर करणे का नाम धारणा है ! ‘ध्यान’ धारणा से सिद्ध होता है ! जिस विषय पर मन को एकाग्र करते है, तद्विषयक अखंड,अटूट सतत विचार प्रवाह का नाम ध्यान है ! ईश्वरीय चेतना के निरंतर प्रवाह को बनाये रखना ध्यान है ! ये मन कि वह स्थिती है जहाँ कोई विषय अथवा विचार नही होते !

dating i pershagen Bad Driburg ध्यान दो प्रकार का होता है; सगुण और निर्गुण ! सगुण ध्यान में साधक अपने इष्ट भगवान जैसे गोरक्षनाथ, दत्तात्रय, हनुमान, शिव अथवा देवी के रूप का ध्यान करता है ! निर्गुण ध्यान में वह अपनी आत्मा पर ध्यान करता है ! नये साधक के लिए सात्विकता बहोत जरुरी है ! ध्यान के लिये प्रत्येक वस्तु सात्विक होनी चाहिए ! भोजन, पहना हुआ वस्र और संगत भी सात्विक होनी चाहिए ! तभी ध्यान में अच्छी प्रगती संभव है ! साधक में उत्साह,संतोष,मन की अविचल स्थिती और एकाग्रता अति आवश्यक है ! पर मन तो हवा की तरह है, भाग जाता है, उसे रोकने से भी नही रुकता ! उसको रोकने के लिए एक ही शस्र है ‘वैराग्य’ ! वैराग्य यह होता है कि जिन चिजों में मन के भागने की बहुत आदत है, उन आदतों से उसको विरक्त कर दिया जाए ! तीव्र आसक्ती वाले साधक कभी ध्यान नही लगा सकते ! जो व्यक्ती ध्यान का संकल्प करता है, उसके लिए अनासक्ति का संकल्प लेना भी जरुरी है ! जो व्यक्ती ध्यान करना चाहता है, उसके लिए मन की चंचलता को कम करने का संकल्प जरुरी है, अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना भी जरुरी है ! ध्यान करने वाला इन संकल्पों के साथ ध्यान का प्रारंभ करता है तो ध्यान का अवतरण होने लग जाता है ! निर्मल हृदय वाला व्यक्ति ध्यान में जल्दी आगे बढ़कर परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है ! हृदय को निर्मल बनाने के लिए जीवन को शुद्ध बनाने की आवश्यकता है ! यज्ञ, दान और तप ये तीनों क्रियायें सदा करते रहना चाहिये !

latest online casino no deposit bonus codes प्रातःकाल ब्रम्हमुहूर्त में ४ से ६ बजे तक ध्यान का अभ्यास करे ! यह वक्त ध्यान के लिए सर्वश्रेष्ठ है ! रात ८ बजे से १० बजे ध्यान ना करे, इस वक्त वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार ज्यादा होता है ! ध्यान के लिए आप एक आसन बना लीजिए जिस पर आप आराम से बैठ सकें ! कुश या कंबल आसन लेकर इसके ऊपर स्वच्छ सफ़ेद रंग का कपडा बिछा दीजिए ! शरीर को ढीला नहीं रखना चाहिये ! ध्यानावस्था में रीढ़ की हड़्डी सीधी रहना अति आवश्यक है ! कोई भी आसन में बैठे चाहे वो पद्मासन हो या सुखासन ! सिर, गर्दन और धड एकसीध में होने चाहिए मानव शरीर में ७२ हजार नाड़ियाँ हैं, जिनसे वायु का सम्बन्ध है ; उनमें ये तीन नाड़ियाँ प्रधान हैं जो योग साधना में सहयोग देनेवाली हैं ! बायीं नाक से जो हवा चलती है, उसे इड़ा कहते हैं ! इड़ा को चंद्र स्वर भी कहते हैं ! इसके देव चन्द्रमा हैं इसलिए इसे शीतल स्वर भी कहा जाता हैं ! इस चंद्र स्वर में ध्यान अच्छा लगता है, प्रकाश साफ आता है ! दाहिनी नाक से जो हवा चलती है, उसे पिंगला कहते हैं ! इसमें गर्म स्वर चलता है इसलिए इसे सूर्य स्वर भी कहा जाता है ! इसके देव सूर्य हैं ! इस स्वर में ध्यान साधारण लगता है, क्योँकि प्रकाश साधारण ललिमा पर रहता है ! सभी प्राणियों में ये स्वर बदलते रहते है, अर्थात बायें से दाहिने तथा दाहिने स्वर से बायें स्वर में ! स्वर बदलते समय कुछ मिनट तक दोनों स्वर चलते हैं ! उसके बाद एक बन्द हो जाता है तथा दूसरा चालू हो जाता है ! जिस समय दोनों चलते हैं, उस समय सुषुम्णा खुल जाती है ! सुषुम्णा में ध्यान अति उत्तम लगता है, अर्थात दोनों स्वर सम रहने पर उत्तम ध्यान लगता है ! ध्यान के लिए अपने नेत्र बंद कर लीजिए ! आप अपने मन को भृकुटि मध्य में स्थिर करने का प्रयास कीजिए ! आज्ञाचक्र में प्रकाश देखने के बहुत से मार्ग हैं, जिनके कुछ दिनों के अभ्यास से प्रकाश धीरे-धीरे दिखने लगता है; जैसे रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायाम ! आप अपनी आती-जाती श्वास पर मन को एकाग्र कर सकते है ! नाक से जब हम साँस अंदर खींचते हैं तो सामान्य प्राणायाम करना पडता है और प्राणायाम में ध्यान करना पडता है ! प्राणायाम ध्यान कि प्रक्रिया है ! जब हम साँस अंदर खींचते हैं तो महसूस करते हैं कि साँस भीतर जा रही हैं, अब यहाँ तक पहुँच गई, इतनी देर तक रुकी रही, इतनी देर तक बाहर निकली, बाहर कितनी देर तक रुकी ये सब ध्यान का हिस्सा है !

https://blekingebioprodukter.se/1025-dse55374-dating-apps-i-oxelösund.html एक बार आपने धारणा हेतू केंद्र का निर्धारण कर लिया है, तो अन्त तक वही चालू रखना होगा ! जैसे यदि आपने धारणा हेतू भृकुटी मध्य का चुनाव किया है, तो कभी भी इसे न बदले ! यदि ध्यानावस्था में मन स्थिर होगा तो प्राणों का स्पंदन भी धीमा पड़ने लगता है ! अपान वायु का स्वभाव है अधोगति ! अपान वायु मनुष्य के निचले भाग में कार्य करती है ! उसकी गति भी निचे की ओर है ! मन के स्थिरहोने से अपान वायु की गति ठहर जाती है तथा अपना व्यावहारिक स्वभाव छोड़कर ऊर्ध्व होने का प्रयास करने लगती है ! यहाँ से ही साधक का सच्चा आध्यात्मिक प्रवास शुरू होता है !

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